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आचार्य आयुर्वेदा

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Hemant Kumar Apr 24, 2024

कामचूड़ामणि रस के लाभों को समझें: एक व्यापक गाइड

 

कामचूड़ामणि रस शुक्रहिन,वीर्यहीन, गतध्वज,नपुंसक और वृद्ध को युवा के समान बल प्रदान करता है। निरस ध्वजभंग,नपुंसक रोगी को भी लाभ पहुंचाता है। इसके अतिरिक्त प्रमेह, मूत्ररोग, अग्निमांद्य, शोथ, रक्तदोष और स्त्रियों के समस्त रोगों को दूर करता है।

यह रसायन शीतबीर्य, पौष्टिक, कामोत्तेजक है। जिन मनुष्यों में अधिक स्त्री समागम से या अन्य रीति से अपने शुक्र,वीर्य को नष्ट कर दिया हो, उनके लिए यह अमृत रूप लाभदायक है। पित्त-प्रधान प्रकृति वाले, गांझा और शराव व्यसनी तथा अति मिर्च आदि गर्म मसाला खाने वालों को इसका सेवन वीर्यवर्धक रूप से कराया जाता है। 

शास्त्र में ध्वजभंगनाशक अनेक औषधियाँ लिखी है। उनमें से अनेकों में अहिफेन(अ-फीम) मिली हुई है जो सत्वर लाभ पहुंचाती हैं, स्तम्भन शक्ति को बढ़ाती हैं, तथा मन को आनंदित बनाती हैं, किन्तु उनका सेवन दीर्घकाल तक करने पर या मात्रा अधिक लेने पर परिणाम में हानि पहुँचती है।

इन अफीम प्रधान औषधियाँ के अतिरिक्त पूर्णचन्द्रोदय(सिद्धमकरध्वज), पुष्पधन्वा आदि औषधियाँ अति उग्र हैं। वे कफ-मेद वालों को अधिक अनुकूल रहती हैं। इनके सेवन से शुक्र में उष्णता उत्पन्न होती है तथा स्त्री-समागम की इच्छा पहले की अपेक्षा बलवत्तर होती जाती है। अतः उन औषधियों को भी स्वस्थ, कामी मनुष्यों के लिए सच्ची लाभदायक नहीं कहेंगे।

कामचूड़ामणि और बसन्तकुसुमाकर आदि रसायन उपरोक्त दोनों प्रकार से भिन्न प्रकार की औषधियाँ हैं। बसन्तकुसुमाकर में रससिन्दूर, अभ्र्क भस्म और कस्तूरी आदि उत्तेजक औषधियों का योग है। 

किंतु कामचूड़ामणि में सब औषधियाँ शामक हैं, केवल कर्पूर एक ही उत्तेजक औषधि मिलाई है। अतः यह वीर्य को गाढ़ा और शीतल बनाता है, शुक्राशय की वातावाहिनियों को दृढ़ बनाता है, मष्तिष्कस्थ केंद्र पर शामक असर पहुंचाकर क्षण-क्षण में उतपन्न होने वाली मानसिक उत्तेजना को शान्त करता है। उष्ण और पतले वीर्य वाले मनुष्यों के लिए यह अति हितकर है। 

वर्तमान में पाश्चात्य शिक्षा-दीक्षा के प्रभाव से कामोत्तेजक औषधियों का प्रचार अत्यधिक बढ़ गया है। शिक्षणदोष, सँगतिदोष से नवयुवकों के ब्रह्मचर्य का भंग विशेषत छोटी आयु में बीर्य के परिपाक काल से पहले ही हो जाता है। अति स्त्री-समागम करने में अपनी बहादुरी मान लेते हैं। किंतु थोड़े समय में ही शक्ति का ह्रास हो जाता है। फिर लज्जावश किसी सुयोग्य हितचिंतक वैद्य की सलाह नहीं लेता और वर्तमान दैनिक समाचार पत्रों(सोशल मीडिया) इत्यादि से पढ़के अति उत्तेजक(कामोत्तेजक) औषधियाँ मंगाकर सेवन करने लगता है। परिणाम में वीर्य अति उष्ण और पतला बन जाता है, मन और देह में अधिकार नहीं रहता, किसी बालिका के स्पर्श से या बहन बेटी आदि को देखते ही(बुद्धि अनुचित मानती है फिर भी) मन में उत्तेजना आकर तत्काल शुक्रपात हो जाता है। एक दिन में 5-7 बार ऐसा होता रहता है। ऐसे रोगियों को बसन्तकुसुमाकर देने पर भी उत्तेजना आकर हानि पहुंचाती है, अतः उनको कामचूड़ामणि का सेवन कराया जाता है।

अति स्त्री समागम, हस्तक्रिया, कृत्रिम उपायों का आश्रय दीर्घकाल तक लेने से, शराव, गाँझा, स्मोकिंग, वृद्धावस्था इत्यादि से उत्पन्न शुक्रक्षय, बीर्य का गर्म व पतलापन, मुखमण्डल निस्तेज, नपुंसकता, देह पाण्डुवर्ण हो जाना, चक्कर आना, वातप्रकोप, ह्रदय की धड़कन बढ़ना, अग्निमांद्य, भूख की कमी, मल में रुकावट, आलस्य, निद्रा की वृद्धि, नेत्रों में लाली, बीर्य में पतलापन, मूत्र में धातु जाना, पाचन शक्ति मंद होना, मूत्रसंस्थान की शिथिलता, बहुमूत्र इत्यादि में कामचूड़ामणि लाभदायक होता है।

यह रसायन जिस तरह पुरुषों के वीर्य/शुक्र को शुद्ध, शीतल, सबल और गाढ़ा बनाता है, उसी तरह स्त्रियों के रज को भी शुद्ध और सबल बनाता है।

कामचूड़ामणि की सामग्री/विधि:- 
द्रव्य:- मुक्तापिष्टी, सुवर्णमाक्षिक भस्म, सुवर्णभस्म, भीमसेनी कर्पूर, जावित्री, जायफल, लौंग, वंगभस्म, और रजतभस्म ये 9 औषधियाँ 2-2 तोले तथा चातुर्जात का चूर्ण 9 तोले ली जाती है।
विधि:- सबको मिलाकर शतावर के रस में 7 दिन तक खरल करके 1-1 रत्ती की गोलियाँ बनाई जाती हैं।

प्रयोग विधि/मात्रा:- 1 गोली प्रातः/सांय धारोष्ण दूध या मिश्री मिले दूध या रोगानुसार अनुपान के साथ (चिकित्सक के निर्देश अनुसार)

【उपरोक्त जानकारी साभार कृष्ण गोपाल आयुर्वेद भवन, कालेडा द्वारा 1947 में प्रकाशित प्रसिद्ध व प्रामाणिक पुस्तक  "रसतंत्रसार व सिद्धप्रयोग संग्रह",द्वि.ख." से】

अस्वीकरण: यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है और पेशेवर चिकित्सा सलाह को प्रतिस्थापित करने का उद्देश्य नहीं रखता। किसी भी नई जड़ी बूटी या उपचार पद्धति की शुरुआत से पहले हमेशा किसी योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करें।