SHUKRAMATRIKA VATI शुक्रमातृका वटी
KRISHNA GOPAL AYURVED BHAWAN, KALERA SHUKRAMATRIKA VATI शुक्रमातृका वटी - 10gm
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KRISHNA GOPAL AYURVED BHAWAN, KALERA

SHUKRAMATRIKA VATI शुक्रमातृका वटी

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शुक्रमातृका वटी के सेवन से वीर्यस्राव, सब प्रकार के वातज, पित्तज, कफज प्रमेह तथा मूत्रकृच्छ्र(मूत्र में रुकावट) आदि दोष दूर होकर वीर्य शुद्ध और गाढ़ा बनता है। यह बल, वर्ण, अग्रि को प्रज्वलित करके जीर्णज्वर (अस्थिगत ज्वर) को नष्ट करता है। अश्मरी (पथरी) में भी लाभदायक है। इसके सेवन से रक्त में रक्ताणुओं की वृद्धि होती है, मांसग्रन्थियां सुदृढ़ बनती है एवं मानसिक शक्ति भी बढ़ती है।

शुक्राशय निर्बल बन जाने पर उसमें शुक्रसंचय अधिक नहीं हो सकता है एवं थोड़ा-सा विघ्न उपस्थित होने पर रात्रि को निद्रा में स्वप्रदोष हो जाता है। मलावरोध रहना, मूत्राशय में मूत्र संग्रह हो जाना, उदर में वायु उत्पन्न होना स्त्री संपर्क का स्वप्न आना, इनमें से कुछ भी कारण बनने पर स्वप्नदोष हो जाता है। उन रोगियों को शुक्रमातृका और चन्दप्रभा का सेवन लम्बे अरसे तक कराया जाय और आग्रहपूर्वक ब्रह्मचर्य पालनसह लघु पथ्य भोजन कराया जाय, तो शुक्राशय को निर्बलता तथा शुक्र का पतलापन दोनों विकृतियां दूर हो जाती हैं।

वर्तमान में समाज के पाश्चात्य शिक्षा दीक्षा वाले नवयुवकों और युवतियों ने बीड़ी, सिगरेट, तमाखू खाना, गरम गरम चाय पीना, तले हुए पदार्थ चाहे तब खाते रहना, अति मिर्च-मसाला और तेज खटाई खाना आदि दुर्व्यसनों को अपनाया है। इनके अतिरिक्त रात्रि का जागरण करना और बार-बार सिनेमा देखना भी उनके लिए सामान्य बात है। इनमें से अधिकांश मनुष्य शारीरिक श्रम भी नहीं करते। जिससे पाचनक्रिया बिगड़ती है एवं शुक्र पतला और गरम रहने लगता है। विषय भोग की लालसा बनी रहती है। परिणाम में उनको जरा सी कामोत्तेजना हुई या दूषित विचार आया, कामशास्त्र की पुस्तक में ऐसे प्रसंग को पढ़ा या छोटी बड़ी बहन बेटी का स्पर्श हुआ, तत्काल शुक्रपात हो जाता है। यदि ये रोगी अपने दुर्व्यसनों को त्याग देवें और संयमशील जीवन के पालनसह शुक्रमातृकावटी और सुवर्णमालिनी बसन्त (या कामचूडामणि) का सेवन लघु मात्रा में लम्बे अरसे तक करें तो भावी जीवन सुखमय बना सकते हैं।

सूचना- शुक्रमातृका वटी से तत्काल लाभ प्राप्त हो इस आशा में बड़ी मात्रा ली जायगी या कुछ दिन सेवन करके छोड़ दी जायगी यो उचित लाभ नहीं मिल सकेगा।

निर्माण विधि/घटक-शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, अभ्रक भस्म और लोहभस्म प्रत्येक ४-४ तोले, छोटी इलायची के दाने, गोखरू-हरड, आंवला, तेजपात, रसौंत, धनियाँ, चव्य, जीरा, तालीसपत्र, सोहागे का फूला और मीठे अनारदाने ये १३ औषधियाँ २-२ तोले तथा शुद्ध गूगल १ तोला लें। पहले पारद और गन्धक की कजली करके अभ्र्कभस्म और लोहभस्म मिलायें। फिर अन्य औषधियों का चूर्ण मिला-गोखरू के क्वाथ  या मीठे अनार के रस में १२ घण्टे घुटाईकर १-१ रत्ती की गोलियां बनायें। (भै.र.)

मात्रा-१ से २ गोली दिन में २ बार जल या बकरी के दूध अथवा मिठे अनार के रस के साथ देवें। 
(चिकित्सक के परामर्श अनुसार प्रयोग करें)

साभार:-"रसतंत्रसार एवं सिद्धप्रयोग संग्रह"



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